विजेट आपके ब्लॉग पर

Tuesday, March 31, 2015

माँ

वह माँ पिलाए दूध देके खून जो पाले ।
घुटकर अंधेरों में भी दे बच्चों को उजाले ।
बेशर्म बेटी बेटे वो माँ जिनकी जीते जी
मरती हो भूँख से न मिलें चार निवाले ।।

काँटों में सोये गोद में जो लाल सुलाये।
बाहों में भर ले चूमे झूमे झूले झुलाये
पापी पिशाच से बड़ा वो आदमी औरत
जो जीते जागते भी अपनी माँ  को रुलाये ।

यह ज़िन्दगी मिली जो बुनियाद तुम्हारी ।
तन्हाइयों में रोज आये याद तुम्हारी   ।
कब सोये चैन से गयी है दूर जबसे माँ -
ममता की प्यासी ही रही औलाद तुम्हारी ।।

माँ मेरी माँ

वंशी धुन में धड़कन धड़कन लोरी गाये मेरी माँ
सपनों में आ यादों में अब भी दुलराये मेरी माँ ।
माँ- मेरी माँ माँ मेरी माँ वो मेरी माँ हाँ मेरी माँ ।
ढली उमर में सपने टूटें
जब रूठें प्यारे अपने
धड़कन की लय पर साँसें भी
माँ का नाम लगीं जपने
दर्द बढ़े जब दिल तड़पाये मन सहलाये मेरी माँ ।
गले लगा ले आँसू पी ले
भर भर लेती बाहों में ।
ममता माँ की गीत ग़ज़ल में
रस भर जाती आहों में ।
नींद न आये आये आकर मुझे सुलाए मेरी माँ ।
धरती पर भगवान सभी के
हों ध्रुव सत्य पिता माता
पले कोख में माँ की प्रभु भी
जब भी दुनियाँ में आता
मन मंदिर में छवि माँ की कवि दीप जलाए मेरी माँ ।
रोम रोम माँ की ममता के गीत सुनाये मेरी माँ ।

पास अगर माँ कभी न माँ की
सेवा का मौक़ा खोना
सच कहता वीरेन्द्र हमारे
जैसा छुप छुप मत रोना ।
फिर मत कहना टेर रहे हम हाय न आये मेरी माँ ।

चढ़ती उमर में

वे उनकी सहमी साँस की आहट के दीवाने ।
ऐसे नजर मिली कि हैं घूँघट के दीवाने  ।।
वीरेन्द्र कहे दर्द कैसे दिल का आप से
चढ़ती उमर में अपनी ही करवट के दीवाने ।
पिटकर भी रहे पीटते हम मोहरे खेल में
देखे खिलाड़ी जो रहे चित पट के दीवाने ।
हमने कभी न लगने हुस्न को दी बदनज़र
बहुतों को देखा रहते हैं झंझट के दीवाने ।
मौसम की मौज खाक मज़ा मानसून का
महबूबा के नहीं है काली लट के दीवाने ।
कहते हैं इंतजार पायदान प्यार का
दहलीज के नहीं रहे हट हट के दीवाने  ।।

सरल बहुत है बच्चों का मन बहलाना भी मेले में
बहुत भीड़ है घड़ी दिला दूंगा चल लाल अकेले मे बचपन रहा भटकता ऐसे देख खिलौने सजे हुए
मुड़कर देखा उलझ गया बच्चा संसार झमेले में

वादा !अच्छे दिन का अच्छे दिन आयेंगे ?

वक़्त पर होगी हुकूमत न इरादा करना  ।
यकीन नेता के वादे का न ज्यादा करना ।
कि सियासत में रहें कोशिशें हुकूमत की
धर्म हो वादा निभाने का भी वादा करना ।।

वादा अच्छे दिन का अच्छे दिन आयेंगे ।
वादे  पूरे  होंगे     वादे   कर   जायेंगे  ।।
मलिका ए हुकूमत  जन्नत जिसकी गोदी
मन मोहन हों प्यारे या मुखिया हों मोदी
दुर्दिन अच्छे दिन की धुन में कट जायेंगे  ।
अपना तन मन चंगा जन गण भूँखा नंगा
हम सबको तार गयी जीते जी माँ गंगा
विश्वास  रहे  गंगा  ! हम स्वच्छ बनायेंगे  ।
मंहगाई सुरसा है ये यन्त्र है भारत का
कल पुर्जों पर पलता जन तंत्र है भारत का
मँहगायी से मिल जुल हम सब टकरायेंगे ।
सरकारें बदलेंगी ये सत्ता का फंडा
अंडे मुर्गी मुर्गे दें मुर्गी दे अंडा
यह काला जादू भी करके दिखलायेंगे  ।।
भगवान् जिसे भेजे पाये वह सिंहासन
जनता सरकारों से माँगे ईंधन राशन
वादा  हम  तारे  भी  धरती  पर  लायेंगे ।
वादा अच्छे दिन का अच्छे दिन आयेंगे ।।

वो????? निकल लिए

वो इतनी गुजारिश भी न माने निकल लिए  ।
बहते हुए पानी में नहाने निकल लिए  ।
दिल में जगाये खौफ बला चढ़ती जवानी
जलते बदन से जल न उठे दरिया में पानी
फिर भी जिगर की आग बुझाने निकल लिए ।
क्या खूब देखे पाँव निगाहें मचल उठीं
क़दमों को चूमने बढ़ीं राहें मचल उठीं
दीदार की ख्वाहिश में सयाने निकल लिए ।
मलमलसा जिस्म और ये मलमल के नहाना
घर से चले हैं जाने कैसे कर के बहाना
बिजली जवाँ दिलों पे गिराने निकल लिए ।
मस्ती में प्यासी मछलियों के जैसा तैरना
राहें भी ऊँची नीची फिसल जाये पैर ना
दिलदार जितने सबको सताने निकल लिए ।
मौसम ये मस्त गाने हवाएं लगीं ग़ज़ल
इनको बनाने वाला भी देखे तो जाए जल
हँसकर वो जमाने को नचाने निकल लिए  ।।।
वीरेन्द्र!हकीकत से बेख़बर है गुलबदन
आँखों में लगी आग निगाहों में है अगन
साँसों में जैसे आग लगाने निकल लिए  ।।


व्यर्थ रहे करवटें बदलते नींद ?

ओव्यर्थ रहे करवटें बदलते नींद न आयी रात भर ।
कसम तुम्हारी रही सताती फिर तन्हाई रात भर ।
अपलक रहीं देखती आँखें दरवाजे से दूर कहीं
आसपासहीकहींसिसकतीदुल्हनलजाईरातभर।
ऐसीआदत यादों से ही लिपटलिपटकर सोनेकी
नींदों की ही उम्मीदों में सेज सजायी रात भर ।
मिले कहाँ कब दूर हुए हम सपने कैसे चूर हुए
सूर बने अनमने रहे रचते कविताई रात भर  ।
फिरमीठीझिडकियांसुनाकरबंदखिड़कियाँ खटकाती
दीवारों से लिपट लिपट रोयी परछाईं रात भर ।
रंग भंग कर जाए पागल अपनी मस्ती में छूकर
अंग अंग से जंग करे भरती अंगड़ाई रात भर ।
कहते लोग अकेले रहते रहते कहाँ अकेले हम
तेरी यादें आ आ कर करतीं पहुनाई रात भर ।
मन के वृन्दावन में नयनों के सूने यमुना तट पर
रस नागर ने गागर भर बाँसुरी बजाई रात भर ।