वक़्त हो थोड़ा अगर कुछ
पास आकर देखिये ।
दर्द शायर दिल का लब से
गुनगुनाकर देखिये ।
गुलशनों जैसी खिलेंगी
दर्द ए दिल की बस्तियाँ
शर्त इतनी ही कभी तो
मुस्कुराकर देखिये ।।
जख्म का मरहम मिलेगा
दिलजलों की बज्म में
दो कदम दरवाजा ए दिल
तक बढ़ाकर देखिये ।
दुम दबाकर दर्द दिल से
दूर भागे किस कदर
दिल से दिल का दर्द
होंठों पर बसाकर देखिये ।
हौसला हर उम्र को
खुलकर सजाने का मिले
आइना आँखों को दम भर
तो बनाकर देखिये ।
दिल को हासिल हो तसल्ली
दूर भी दिल्ली कहाँ
देखिये आकर अगर दम
हो तो जाकर देखिये ।
बेकरारी दो निगाहों में बढे
कब किस कदर
सामने आकर कभी
पर्दा हटाकर देखिये ।।
वृन्दावन ! आसवन भक्ति का , नवरस नस-नस मनभावन / वर दें आप, ताप मिट जाएँ , रस बरसे पग-पग पावन / व्यंजन-स्वर परसें मनभावन , नव रस का बरसे सावन / वंदन! वचन सुधा रस चाहे , प्रिय आओ इस वृन्दावन /
Sunday, April 5, 2015
वक़्त हो थोड़ा
वो हसीं यादों के लश्कर
दर्द के आँख ने कितनेही समन्दर देखे ।
इश्क में होते फ़ना ऐसे कलन्दर देखे ।
लूटकर एक रोज मौत के हाथों लुटते
यहाँ से खाली हाथ जाते सिकन्दर देखे ।
वो हँसी यादों के लश्कर शाम से आने लगे
या ख़ुदा पैग़ाम दिल के नाम से आने लगे ।।
कैसे हो मुश्किल हिफ़ाजत
दिल की दिलवर रात भर -
नींद के दुश्मन ! बड़े आराम से आने लगे ।।
खाक़ होंगे गुल न क्यों गुलशन बहार ए दौर में
बागबाँ खुद ही नज़र गुलफाम से आने लगे ।
वो जिन्हों ने इक नज़र देखा न हरगिज राह में
अब दिलएदहलीज तक कुछ काम से आने लगे
आशिक़ी के दर्द का आग़ाज जिनकी फितरतें
आज साज ए साँस के अंजाम से आने लगे ।
कोशिशें जब कीं अजब ढाए तलब ने जब ग़ज़ब
जो न आये तब वो लैब तक जाम से आने लगे ।
आप अपने से
आप अपने से जब हों पराये ।
साथ साया भी पथ पर न आये ।
पंथ पर पाँव थक जावें तन चूर हो
स्वप्न संसार नयनों से जब दूर हो
सुख में रहते हुए तृप्ति की प्यास में
उम्र की ओढ़नी क्षीण बेनूर हो
राह पर साथ चलते हुए चुप रहे
कोई आवाज दे मत बुलाये ।
प्रात से रात नूतन शुभारम्भ हो
चाहे जितना सुदृढ़ धैर्य स्तम्भ हो
आ ही जाए दबे पाँव नीरस हवा
बाग रक्षक के मानस में जब दंभ हो
चाँदनी में अगर नित्य तन मन जले
और धुवां भी कहीं से न आये ।।
लोभ मद काम हो क्रोध का संचयन
रात दिन व्यग्र रहने लगें यदि नयन
शान्ति की भ्रान्ति में कान्ति लुटती रही
स्वप्न में एक पल भी न भाए शयन
कोई लोरी न गाकर सुलाए ।
आप से जब गले लग न भाई मिले
सामने सारी दुनियाँ पराई मिले
जान लेने लगें रिश्ते नाते अगर
आस क्या प्यास पग पग सतायी मिले ।
पाप का पुण्य का हर गणित दृष्टि का
लाख जोड़े कोई या घटाए ।।।
आईला छू आ---
वादे नहीं राजा आजा कर कोशिशें
आज पूरी कर ले ज़रा तो ख्वाहिशें
ज़िन्दगी है खेल !खेल खेल खेल में
खेल ये अनोखा चोखा ई लू ई लू ।
शोला जैसी सोलह की ये गड्डी मेरी जान
जाना नहीं रह भी फिसड्डी मेरी जान
जान मेरी रहती जवानी चार दिन
थोड़ी देर खेल ले कबड्डी मेरी जान
खेल का मैदान ये बदन हू ब हू ।आईला छू ।
रेल चले टेसन से जैसे रुक रुक
जिस्म ये जवान देख ब्यूटीफुल लुक
गेम बड़ा लवली न कर शेम शेम
मार ले मैदान जीते बिन नहीं रुक
हाथ पाँव मार करना है तू तू तू ।।।आईला छू ।
खेल ये अगाड़ी से पिछाड़ी से भी खेल
पढ़ा लिखा खेले औ अनाड़ी सके खेल
देखते ही देखते हो जाए चैंपियन
राजा आ जा कोई भी खिलाड़ी सके खेल
सर चढ़ने दे आईला छू का जादू ।आईला छू
जान जब जाये*********
जान जब जाये कभी पास मेरी जान न हो ।
मौत आने का जिन्दगी कहीं गुमान न हो ।।
कोई नफ़रत न मुहब्बत रहे खयालों में---
साँस में आरती लब पर कोई अजान न हो ।
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दर्द का गीत आओ ऐसा भी गाया जाए ।
दर्द सहकर भी ज़माने को हँसाया जाए ।
गीत वरदान ये वैभव है गुनगुनाना भी
जख्म ताज़ा हो या सालों का हो पुराना भी
घाव पर प्यार का मरहम ये लगाया जाए ।
दर्द सहकर भी +++++++++
आख़िरी सांस तलक प्यार की ये पीर चले
आँसू की शक्ल में ग़र पीर भरा तीर चले
अश्क़ नायाब खजाना न लुटाया जाए ।
दर्द सहकर भी **********
दो नयन जिनमें पले ख्वाब की रानी हूँ मैं
ऐसा लगता है कि मीरा सी दीवानी हूँ मैं
आह इकतारा भी दिल का ये बजाया जाए ।
दर्द सहकर भी -----------
नींद आये न कभी हाय जो रजनी आये
आह हो कैसा जतन पहलू में सजनी आये
आये दम भर कभी वो रास रचाया जाये ।।
दर्द सहकर भी ज़माने को हँसाया जाए ।।।
देखते और दर्पण रहे हम अगर ???????
देखते और दर्पण रहे हम अगर
देखते रूप ढल जायेगी चाँदनी ।
हार किरणों के जगमग सजा देह पर
भोर आकर निगल जायेगी चाँदनी ।
तेज रफ़्तार इतनी चले जिन्दगी
सांस या प्यास का क्या ठिकाना प्रिये ?
टूटकर कांच जैसा बिखर जाएगा
मत लगा चितवनों से निशाना प्रिये ।
कब बदल जाए भी बदलियों की नज़र
यह चमक लाये आये न कल चाँदनी ।
दृष्टि में नेह के मेघ उमड़े न यदि
व्यर्थ कितना उनींदे नयन आँज लो
तन का तिल तिल महकने लगेगी सुछवि
अंग पर प्यार का किरकिरा राँज लो
भाँज लो एक होने का मन से हुनर
हाथ !आयी , न जाये निकल चाँदनी ।
Tuesday, March 31, 2015
कुण्डलियाँ
सत्य प्राणघाती हुए राजनीति के लोग ।
खोल कपाट विवेक के मत का करें प्रयोग ।।
मत का करें प्रयोग रहें तन मन से चंगे ।1
चुनें न उनको जो फ़ितरत में कजोर लफंगे ।।
कविताई में युक्ति कहें वीरेन्द्र तिवारी ।।।
शोषण नहीं करे पोषण सरकार हमारी ।।।
वंदन जन जन को नमन नेता सब बे ईमान ।
हैं कुपात्र पर हो गए भारत के भगवान ।
भारत के भगवान यान से आते जाते ।
जनता से वीरेन्द्र शेष सच मत के नाते ।
किसी कुपात्री को अमृत मत दान न करना ।
उचित प्रयोग करो मत को कुर्बान न करना ।
आज़ादी में लीडरों ने दी निशि दिन चोट ।
रक्तबीज होते गए लूट लूट कर वोट ।
लूट लूट कर वोट नए करतब दिखलाते ।
पाँच वर्ष में जन अधिकार हजम कर जाते ।
व्यर्थ बन्दरों को वीरेन्द्र न देना छूरा ।
कपटी लीडर देश हजम कर लेंगे पूरा ।
मत के उचित प्रयोग का सब का हो अभियान ।
जन मत से सम्पन्न हो सब विधि हिन्दुस्तान ।
सब विधि हिन्दुस्तान मिटे सारी निर्धनता ।
विकसित हो सुख शान्ति पुष्ट हो ऐसे जनता ।
सच्चाई की राह चले सरकार हमारी ।
दुनियाँ गाये गीत रचे वीरेन्द्र तिवारी ।।।
पण्डित मुल्ला हो कोई कुर्मी काछी जाट ।
वोट उसे कर दे खड़ी घोटालों की खाट ।
घोटालों की खाट बन्द हों काले धन्धे ।
लोग गाँठ के पूरे रहें न हों पर अन्धे ।
चलो उठें वीरेन्द्र उन्हें अब वोट करेंगे ।
चुनें उन्हें दें वचन न कोई खोट करेंगे ।
