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Wednesday, September 7, 2011

-बन जाऊँगा-

तुम ! संवरती रहीं  बेखबर  सारा  दिन ,
 लट कसम , सुरमई शाम बन जाऊँगा /
आँखों में ,  यूँ  ही  सागर छलकते  रहे,
 मयकशी  की कसम,जाम बन जाऊँगा  /
सारी   दीवानगी  की  , हदें - सरहदें   -
 बंदिशें तोड़कर,जान- ए- मन एक दिन -
राम बन जाऊँगा, तुम हो सीता अगर ,
राधिका हो प्रिये  , श्याम बन जाऊँगा //


2 comments:

वन्दना said...

वाह ……कोमल भावो की सुन्दर अभिव्यक्ति।

रविकर said...

राम बन जाऊँगा, तुम हो सीता अगर ||

सुन्दर ||